जनपद गौतमबुद्धनगर में किसान संगठनों की समानांतर तालिबानी व्यवस्था 

राजेश बैरागी।क्या जनपद गौतमबुद्धनगर में सक्रिय पांच दर्जन किसान संगठनों और तालिबान में कोई समानता है?आज मंगलवार को ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण ने दल-बल सहित जाकर अपने अधिसूचित क्षेत्र के गांव तालड़ा झालड़ा में लगभग पचास बीघा भूमि पर अवैध रूप से विकसित की जा रही कॉलोनियों को ध्वस्त करने की कार्रवाई की। मुझे इस कार्रवाई के कुछ समय बाद एक जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक का संदेश प्राप्त हुआ कि इस कार्रवाई के दौरान जनपद में कुकुरमुत्ते की भांति उग आए तथाकथित किसान संगठनों में से एक किसान संगठन के लोग अवैध कॉलोनाइजर्स के पक्ष में प्राधिकरण की टीम से भिड़ने के लिए वहां आ पहुंचे। उन्होंने प्राधिकरण को कार्रवाई करने से रोकने की पुरजोर कोशिश की। प्राधिकरण द्वारा जारी प्रेस नोट में दावा किया गया है प्राधिकरण ने कार्रवाई को सफलता पूर्वक अंजाम दिया जबकि सूत्र बता रहे हैं कि तथाकथित किसान संगठन के प्रतिरोध के चलते प्राधिकरण की कार्रवाई औपचारिक रही। क्या जनपद गौतमबुद्धनगर में हरी टोपी अवैध कब्जों और अवैध कॉलोनियों की रक्षा का पर्याय बन गई है? नोएडा ग्रेटर नोएडा और यीडा प्राधिकरणों में सुबह कार्यालय खुलने से लेकर देर शाम तक हरी टोपी लगाए हुए लोग अधिकारियों के आसपास मंडराते दिखाई देते हैं। क्या ये लोग वास्तव में किसानों की समस्याओं को हल कराने के लिए अपना दिन तमाम करते हैं? मुझे लगता है कि यह जनपद अफगानिस्तान में तालिबान की तर्ज पर तथाकथित किसान संगठनों की समानांतर व्यवस्था का शिकार हो चुका है। पिछले एक डेढ़ दशक में इन प्राधिकरणों के निकम्मेपन और भ्रष्टाचार के परिणामस्वरूप किसान संगठनों का मुखौटा पहनकर दलालों और ब्लैकमेलिंग करने वाले लोगों ने व्यवस्था पर अपना वर्चस्व कायम कर लिया है। एक सज्जन जो आज ही अपनी समस्या लेकर यमुना प्राधिकरण में आए थे, ने बताया कि एक गांव में भारतीय किसान यूनियन के नाम से तीन संगठन बने हुए हैं और उन्हें संचालित करने वाले लोगों ने स्वयं को अपने संगठन का राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित किया हुआ है। यमुना प्राधिकरण में बाकायदा पत्रावलियों पर सिफारिश करने वाले तथाकथित किसान नेताओं के नाम लिखे जा रहे हैं। इससे अधिकारी पत्रावली के महत्व को तय करते हैं। क्या भूमाफियाओं, अवैध कब्जा करने वालों और अवैध कॉलोनाइजर्स की रक्षा में आगे आने वाले तथाकथित किसान संगठनों और उनके नेताओं का कच्चा चिट्ठा तैयार कर सार्वजनिक करना प्राधिकरणों और पुलिस प्रशासन का दायित्व नहीं है?साल दो साल तीन साल नौकरी करने आने वाले अधिकारी ऐसे किसी झंझट में नहीं पड़ना चाहते। यही किसान नेताओं की असल ताकत है।(

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