राजेश बैरागी।उत्तर प्रदेश के पहले भाजपाई मुख्यमंत्री रहे स्व कल्याण सिंह को लेकर हमारी आम धारणा क्या है?जब वह पहली बार मुख्यमंत्री बने, मैंने तब अपने पत्रकार जीवन की शुरुआत की थी। लखनऊ से दूर किंतु राज्य के तबके सबसे महत्वपूर्ण जनपद गाजियाबाद में पत्रकारिता करते हुए सत्ता की दशा और दिशा को काफी हद तक समझा और जाना जा सकता था। मैं उन्हें एक सख्त प्रशासक, बिना लेन-देन ट्रांसफर पोस्टिंग करने वाले,राम मंदिर के लिए सफलतापूर्वक बाबरी मस्जिद के विवादित ढांचे को ढहवा देने तथा बिना विलंब किए मुख्यमंत्री पद को त्याग देने वाला राजनीतिज्ञ मानता हूं। हालांकि मेरा यह आंकलन उनके प्रथम कार्यकाल की सीमा में बंधा है। अपने दूसरे कार्यकाल में कल्याण सिंह ने कुछ अभूतपूर्व कार्य किए जिनमें बसपा को तबाह कर भाजपा की सरकार बरकरार रखने, कुसुम राय नामक महिला के लिए सत्ता और साख दांव पर लगा देने, अपनी ही पार्टी की केंद्र सरकार के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई को मतभेद होने पर पियक्कड़ और भुलक्कड़ जैसे अशोभनीय संबोधनों से नवाजने और अंततः भाजपा छोड़ कर अपने धुर विरोधी मुलायम सिंह यादव की गोद में जा बैठने की घटनाएं प्रमुख थीं।आज के कुछ क्षेत्रीय समाचार पत्रों में स्व कल्याण सिंह की चतुर्थ पुण्यतिथि पर कल 21 अगस्त को अलीगढ़ में आयोजित किए जाने वाले एक कार्यक्रम का विज्ञापन प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ है। यह विज्ञापन उनके पुत्र राजवीर सिंह ‘राजू भैया ‘, संदीप सिंह व सौरभ सिंह पौत्रों की ओर से जारी किया गया है। इसमें स्व कल्याण सिंह को हिंदू हृदय सम्राट, पूर्व राज्यपाल के साथ साथ पद्म विभूषण भी बताया गया है। निस्संदेह ये तीनों उपाधियां कल्याण सिंह को हासिल हुई थीं। परंतु क्या एक समय भारतीय राजनीति की दशा और दिशा बदलकर रख देने वाले नेता कल्याण सिंह को जानने के लिए यह सब बताना आवश्यक है। मुझे लगता है कि कल्याण सिंह जिन ऊंचाईयों तक पहुंचे और उसके बाद मानवीय कमजोरियों के शिकार होकर उन्होंने स्वयं के पतन का मार्ग चुना,उस सबके बाद असाधारण व्यक्ति भी सामान्य उपाधियों के सहारे पहचान के लिए आश्रित हो जाता है। उनके पुत्र और पौत्र तो अपने पिता और पितामह की पहचान की रोशनी से प्रकाशित हैं ही
कल्याण सिंह: एक असाधारण व्यक्तित्व की पहचान की खातिर









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