सक्षम न्यायालयों का आलोचना विरोध

राजेश बैरागी।क्या न्यायालय अपनी आलोचना सुनने की क्षमता खो बैठे हैं? मैं एनसीईआरटी की आठवीं कक्षा की पुस्तक के उस अध्याय को पढ़ने से चूक गया जिसमें न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार से छात्रों को अवगत कराया जाना था परंतु गौतमबुद्धनगर (उत्तर प्रदेश) जिला न्यायालय के उस सत्र न्यायाधीश को बखूबी सुना जिसने हाल ही में खुली अदालत में कहा,- यहां के अधिवक्ता समानता के आधार पर उन मामलों में जमानत लेने चले आते हैं जिनमें बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और सचिव जमानत ले चुके होते हैं।’ सत्र न्यायाधीश की यह टिप्पणी क्या संदेश देती है? क्या न्यायालय बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और सचिव जैसे प्रभावशाली लोगों के संकेतों पर फैसले लेती हैं या उनके और प्रभावशाली लोगों के बीच कोई ऐसा संबंध है जिसे भ्रष्टाचार कहा जा सकता है? एनसीईआरटी की आठवीं कक्षा की पुस्तक के उस अध्याय को लेकर भारत के प्रधान न्यायाधीश का रौष देखने योग्य था। उन्होंने कहा ‘-न्यायपालिका लहुलुहान है,उस पर गोलियां चलाई गईं।’ हो सकता है कि उस अध्याय में कुछ अतिरेक बातें कही गई हों। देश भर के न्यायालय मुकदमों के बोझ से दबे हुए हैं। क्या इसके लिए केवल न्यायिक अधिकारियों की कमी ही एकमात्र कारण है? गौतमबुद्धनगर जनपद न्यायालय में कई न्यायिक अधिकारी निर्धारित समय के एक डेढ़ घंटे बाद पीठ पर आसीन होते हैं और आधा दर्जन से भी कम पत्रावलियों को सुनने के बाद शेष सैकड़ों मुकदमों में अगली तारीख देने का हुक्म सुना दिया जाता है। जहां न्यायिक दायित्व की बात आती है वहां उनका व्यवहार ऐसा है और जहां न्यायिक अधिकार की बात आती है तो मुकदमा दर्ज होने वाले दिन ही प्रतिवादी को सुने बगैर स्टे ऑर्डर जारी कर दिया जाता है। न्यायालय सबसे अधिक भ्रष्ट हैं, यह प्रश्न आलोचना के दायरे में हो सकता है परंतु न्यायालयों में व्याप्त भ्रष्टाचार को आलोचना या चर्चा से परे रखा जाना अनिवार्य है, यह कानून व्यवस्था, सूचना के अधिकार और अभिव्यक्ति के अधिकार को रद्द करने जैसा है। मुझे लगता है कि भारत के प्रधान न्यायाधीश को देश के नागरिकों के मौलिक अधिकारों का सर्वोच्च रक्षक होने के नाते भी अपनी आलोचना से आक्रोशित नहीं होना चाहिए। सुधार के लिए आलोचना की आवश्यकता को झुठलाया तो नहीं जा सकता है।

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