युवराज की मौत को लेकर पिता पुत्री पर अमर्यादित टिप्पणियों का औचित्य?

राजेश बैरागी।नोएडा के सेक्टर 150 में एक भूखंड में भरे पानी में डूबकर युवा इंजीनियर युवराज की मौत से देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का क्या कोई सीधा संबंध है? इस प्रश्न का जन्म सोशल मीडिया पर इस घटना को लेकर व्यक्त की जा रही उन तीखी और अमर्यादित टिप्पणियों के गर्भ से हुआ है जिनमें जानबूझकर देश की एक संवैधानिक संस्था के मुखिया को बार-बार उल्लिखित किया जा रहा है। मैं अचरज में हूं कि अभी तक एक बार भी उत्तर प्रदेश सरकार के मुखिया योगी आदित्यनाथ को किसी ने भी लानत नहीं भेजी है जो सीधे तौर पर जनपद गौतमबुद्धनगर में तथाकथित निकम्मे, संवेदनहीन अधिकारियों को नियुक्त करने के लिए जिम्मेदार हैं। यह स्पष्ट हो चुका है कि 18 जनवरी की उस रात कमिश्नरेट पुलिस तथा जिला प्रशासन के उच्चाधिकारी कंबल तान कर सो रहे थे और उसके बाद भी उन्होंने अपनी जिम्मेदारी की कोई परवाह नहीं की। शासन द्वारा गठित विशेष जांच दल (एस आई टी)चाहे जो रिपोर्ट तैयार करे और चाहे जिस अधिकारी को उसके निकम्मेपन से बरी कर दे परंतु जो हुआ वह इस शो विंडो शहर की साख पर लगे कलंक को तो नहीं मिटा सकता है।तो फिर ज्ञानेश कुमार लोगों के निशाने पर क्यों हैं? क्या इसलिए कि उनकी बेटी मेधा रूपम गौतमबुद्धनगर की जिलाधिकारी हैं। और मेधा रूपम की ही इसलिए क्यों आलोचना की जानी चाहिए कि वे ज्ञानेश कुमार की बेटी हैं। राजनीतिक, प्रशासनिक या किसी अन्य क्षेत्र में उच्च पदों पर पहुंचे लोगों के पुत्र पुत्रियों को भी इस देश में अपनी योग्यता के आधार पर पद और प्रतिष्ठा पाने का अधिकार है। पिता या संबंधियों के प्रभाव से मनपसंद नियुक्ति पाने का अधिकार तो नहीं है परंतु यह सर्वव्यापी व्यवस्था है जिसमें संबंधों का लाभ उठाया जाता है। सोशल मीडिया अपने दुरुपयोग से त्राहि त्राहि कर रहा है। एक अधिकारी के तौर पर मेधा रूपम की असंवेदनशीलता, कर्तव्यहीनता, लापरवाही, मामले की गंभीरता न समझने की अयोग्यता को लेकर खूब आलोचना की जानी चाहिए। उनका इस सब के लिए एक महिला होने का भी लिहाज करने की आवश्यकता नहीं है। परंतु पिता को लेकर पुत्री की और पुत्री को लेकर पिता की अमर्यादित आलोचना करने से क्या हासिल? इससे मामले की गंभीरता न केवल नष्ट हो जाती है बल्कि यह निजी खुन्नस और कुंठाओ का सस्ता प्रदर्शन बन जाता है।(

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