धर्मेंद्र थे तो मुमकिन था

राजेश बैरागी।क्या हम हिंदी सिनेमा के इतिहास में अमिताभ बच्चन से पहले धर्मेंद्र के अलावा किसी अन्य नायक को जानते हैं जिस पर खलनायकों के छक्के छुड़ाने का भरोसा रहा हो? अकेले धर्मेंद्र ऐसे नायक थे जिनके चेहरे के भाव और फड़कती भुजाओं को देखकर दर्शक गर्व से भर जाते थे। राजकपूर, देवानंद, दिलीप कुमार, विश्वजीत,जॉय मुखर्जी, संजय और फिरोज खान, मनोज कुमार, राजेन्द्र कुमार आदि आदि नायकों ने भी अपने अभिनय संग्राम में सम्मुख खलनायकों पर विजय हासिल की ही थीं परंतु धर्मेंद्र की बात अलग थी। शाहदरा (दिल्ली) में एक युवक ने अपना नाम बदलकर धर्मेंद्र ही नहीं रखा बल्कि वह धर्मेंद्र टाइम्स नाम से समाचार पत्र भी प्रकाशित करता था।यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि उसके समाचार पत्र में किस हिंदी सिनेमा नायक के समाचार प्रमुखता से प्रकाशित होते होंगे। बताया जाता है कि वह युवक धर्मेंद्र की शान में गुस्ताखी करने वाले को चाकू मार देता था। मेरे पिताजी जो आसानी से किसी से प्रभावित नहीं होते थे, धर्मेंद्र से हृदय से जुड़े थे। देशभर में धर्मेंद्र के ऐसे कट्टर फैंस की लंबी श्रृंखला रही है। सिद्धांत, नैतिकता के साथ मसखरी की भूमिका भी उनकी अनूठी थी। अक्सर हम ऐसे लोगों को बूढ़ा देखकर निराश होते हैं जिन्हें हम अपना सच्चा नायक मानते हैं। धर्मेंद्र ऐसे ही कलाकार थे। उन्हें अपने समय की सभी शीर्ष अभिनेत्रियों के साथ काम करने का अवसर मिला। उनमें से कई उनके प्रति आकर्षित भी थीं। उन्हीं में से एक स्वप्न सुंदरी हेमा मालिनी को उन्होंने अपने जीवन की दूसरी संगिनी बनाया। इस बारे में कोई जानकारी सार्वजनिक नहीं है कि हेमा से दूसरा ब्याह रचाने के बाद उनका पहली पत्नी प्रकाश कौर के साथ कैसा संबंध रहा। परंतु यह जानकारी सार्वजनिक है कि प्रकाश कौर का अपने परिवार से और धर्मेंद्र का अपने सभी बच्चों से खरा संबंध रहा। धर्मेंद्र को बहुत से सिने अवार्ड और भारत का दूसरा सर्वोच्च पुरस्कार पद्म भूषण भी मिला परंतु उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार नहीं दिया गया जबकि शशि कपूर को यह पुरस्कार हासिल हुआ। क्या दोनों अभिनेताओं के बीच फाल्के पुरस्कार का यह उचित चयन था? ऐसे अनुचित चुनाव से ही पुरस्कार अपनी गरिमा और विश्वसनीयता खो देते हैं। मुझे लगता है कि धर्मेंद्र की अभिनय यात्रा के लिए फाल्के पुरस्कार एक छोटा मुकाम था।आज जीवन के अस्सीवें साल में उन्होंने इस असार संसार से विदा ली है। क्या कोई फनकार कभी मर सकता है? धर्मेंद्र के लिए भी यह प्रश्न अनुत्तरित ही है

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