मदर इंडिया के सुक्खी लाला से आधुनिक बिल्डरों तक 

राजेश बैरागी।मैंने आज एक बार फिर कालजयी हिंदी फिल्म ‘मदर इंडिया’ को पूरी तन्मयता से देखा। मैं सुक्खी लाला सरीखे दुष्ट मुनाफाखोर सेठों की कारगुजारियों से कभी क्षुब्ध नहीं होता हूं।उनका जन्म अनैतिक कार्यों के लिए ही होता है। उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य येन केन आम नागरिकों को अपने दुष्चक्र में फंसाकर उनका शोषण करना ही होता है। मुझे हमेशा समाज के ऐसे कोढ़ों को फैलने से रोकने और नष्ट करने वाले जिम्मेदार लोगों की हरामखोरी से शिकायत रही है। सरकारी अधिकारी और नेताओं ने नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के दायित्व के लिए स्वयं को प्रस्तुत किया होता है। क्या वे ऐसा करते हैं? यदि उन्होंने ऐसा किया होता तो नोएडा ग्रेटर नोएडा जैसे शहरों में सुक्खी लाला सरीखे बिल्डर चौराहे पर और डंके की चोट पर लाखों फ्लैट खरीदारों के परिश्रम की कमाई का गबन कैसे कर सकते थे। पिछले लगभग दो दशक में नोएडा ग्रेटर नोएडा में कुकुरमुत्ते की भांति पैदा होने वाले अनेक बिल्डरों की निजी क्षमता स्वयं एक फ्लैट खरीदने की भी नहीं थी। इसके बावजूद वो लाखों लोगों को आशियाना देने जैसी हैसियत में आ गए। सुक्खी लाला खेती नहीं करता था परंतु खेत से पैदा होने वाली फसल पर पहला हक उसका होता था।’मदर इंडिया’ फिल्म का फलक एक गांव तक सीमित है जहां निर्धन और अनपढ़ किसानों को एक दुष्ट चतुर सेठ जरखरीद गुलाम की भांति उपयोग करता है। नोएडा ग्रेटर नोएडा वैसे गांव नहीं हैं और न एक अदद फ्लैट के लिए अपनी पूंजी निवेश करने वाले लोग अशिक्षित ही हैं। परंतु तंत्र ने दुष्ट, मुनाफाखोर और शोषण करने वाले सुक्खी लाला सरीखे बिल्डरों का साथ देकर उन्हें उन ग्रामीणों से भी बद्तर हालात में पहुंचा दिया है। क्या आम नागरिकों के इस शोषण और उत्पीड़न के लिए केवल बिल्डर जिम्मेदार हैं? सरकार और उसके नुमाइंदे तथा हक दिलाने वाले हाकिमों को क्या कहा जाए? यदि इस अन्यायी व्यवस्था से कोई बिरजू बगावत करे तो क्या उसे गोली मार देनी चाहिए? तंत्र ने यह व्यवस्था पहले से ही की हुई है।(

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