बुलडोजर कार्रवाई की कीमत मिली तीस लाख रुपए!
राजेश बैरागी।ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के अधिसूचित क्षेत्र की सीमा पर बसे गांव झालड़ा में पिछले दिनों प्राधिकरण का बुलडोजर गरजा। हालांकि यह रहस्य बरकरार है कि समूचे शहर में गांव गांव और मुख्य मार्गों पर बसाई जा रही अवैध कॉलोनियों को छोड़कर प्राधिकरण का तोड़फोड़ दस्ता सीमा पर बसे गांव में ही बुलडोजर गर्जना करने क्यों गया था। बहरहाल बुलडोजर गरजा तो उसका विरोध करने वाले भी वहां आ पहुंचे।हरी टोपी और हरा पटका अब किसी किसान यूनियन का नहीं बल्कि अवैध कब्जे और अवैध कॉलोनियों के संरक्षण का प्रतीक बन गया है। ऐसे हरी टोपी और हरे पटके वाले लोगों ने वहां पहुंचकर प्राधिकरण की बेहद आक्रामक कार्रवाई को रोक दिया। दोनों ओर से नोंक झोंक हुई। कुछ बड़े अधिकारी भी मौके पर पहुंचे। लब्बोलुआब यह कि घटनास्थल पर कार्रवाई औपचारिक रही परंतु प्रैस नोटों में कार्रवाई होने और कार्रवाई न होने देने के दावे किए गए। क्या यह कथा यहीं पर संपन्न हो गई?उस दिन लौट गया प्राधिकरण क्या फिर बुलडोजर लेकर नहीं आ सकता है? इस आगामी भय का विचार लेकर कुछ लोग सक्रिय हुए। उन्हें एक जनप्रतिनिधि का प्रतिनिधि बताया जाता है। उन्होंने अवैध निर्माण कर रहे लोगों को प्राधिकरण के भय से मुक्ति दिलाने का उपाय बताया। सूत्रों का दावा है कि बात पचास लाख से शुरू होकर तीस लाख पर रुकी। अब कहीं भी न ढहाने का उत्साह है और न कहीं ढहने का भय। इस गॉसिप में मैं यह बताना भूल ही गया कि आखिर सीमा पर स्थित गांव में ही ढहाने की कार्रवाई क्यों की गई जबकि वह स्थान दूरबीन लगाकर देखना मुश्किल है? यह प्रश्न आपको जनप्रतिनिधि के प्रतिनिधि से पूछना चाहिए जो पहले प्राधिकरण के संबंधित वर्क सर्किल को लोकेशन बताते हैं और फिर मामला निपटवाते हैं। जनप्रतिनिधियों का प्रतिनिधि होने का कोई वेतन तो मिलता नहीं है









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