राजेश बैरागी।क्या जंगली जानवरों का भी जंगलराज से मन ऊबने लगा है?गाजियाबाद के गोविंदपुरम में एक स्कूल में एक तेंदुए के पहुंचने के क्या मायने हैं?हो सकता है कि वह शहरी बनने की अभिलाषा लेकर जंगल से शहर आया हो। तो उसे शहर में घूमना चाहिए था।वह स्कूल में क्यों आया होगा? दरअसल शहर में रहने के बावजूद अनपढ़ रहने की अपनी समस्याएं हैं। शहरी को शिक्षित होना ही चाहिए।कम से कम अक्षर ज्ञान तो हो ही।तेंदुआ जंगली जीवन से शहरी होने की इसी पहली शर्त को पूरा करने के लिए स्कूल में घुसा होगा। दरवाजे से सीधे प्रवेश न मिलने की समझ रखने वाले तेंदुएं ने स्कूल में प्रवेश के लिए दीवार फांदने का रास्ता चुना। स्कूल में दरवाजे से सीधे प्रवेश तो मनुष्य के भी सभी बच्चों को नहीं मिलता। शिक्षा के अधिकार का पर्चा लेकर रोजाना न जाने कितने मनुष्य अपने बच्चों के साथ बेसिक शिक्षा अधिकारी के कार्यालय में हाजिरी बजाते हैं। वहां से मिले अनुमति पत्र को शिक्षा के उद्योगपति महत्व नहीं देते। तो इन सब बातों से भली-भांति परिचित तेंदुएं ने चतुर मनुष्यों की भांति शॉर्टकट पकड़ा और दीवार फांदकर स्कूल में प्रवेश कर गया। क्या इतने भर से उसे शिक्षा का अधिकार हासिल हो सकता था? हालांकि उसे शिक्षित होने से पहले किसी कच्ची कॉलोनी में भूमाफिया की कृपा से सिर छुपाने का प्रबंध करना चाहिए था। प्राधिकरणों द्वारा विकसित सेक्टरों में भूखंड और भवन तो उसे मिलने से रहा। बहरहाल तेंदुआ जब तक प्रधानाचार्य से मिलकर अपने शहरी बनने की अभिलाषा को पूरा करने की प्रार्थना करता कि उसपर सुरक्षा गार्ड की निगाह पड़ गई। यह वही सुरक्षा गार्ड होते हैं जो शिक्षा उद्यमियों की निर्धारित योग्यता न रखने वाले बच्चों और उनके अभिभावकों को स्कूल में प्रवेश नहीं करने देते हैं। क्या उन सुरक्षा गार्डों के बच्चे उन स्कूलों में शिक्षा के लिए प्रवेश कर पाते हैं? दूसरों के रास्ते बंद करने वाले का रास्ता ऊपर वाला बंद कर देता है। सुरक्षा गार्ड ने शोर मचा दिया।भला एक तेंदुए का शिक्षा पर अधिकार कैसे हो सकता है। चारों ओर शोर मच गया। एक तेंदुए ने उसके लिए हमेशा से प्रतिबंधित अधिकार को प्राप्त करने का दुस्साहस जो किया था। कभी दलितों को भी इसी प्रकार स्कूलों में प्रवेश करते देख अवश्य ही शोर मचा होगा।तेंदुआ ऐसे शोर का अभ्यस्त नहीं होता है। उसे यह भी समझ नहीं आया होगा कि उसने शिक्षा के लिए स्कूल आकर कौन सा अपराध कर दिया है। शिक्षा के लिए स्कूल के अतिरिक्त कौन सा स्थान है।शोर और हांका सुनकर वह घबरा गया। ऐसा जंगल में शिकार के समय होता है। क्या स्कूल भी जंगल का ही एक रूप है। इसी हड़बड़ी में वह स्कूल के पीछे की ओर भागा। शिक्षा तो बाद की बात है पहले जान तो बचे। अब तेंदुए की सामाजिकता और समझदारी को दाद दीजिए।वह जान बचाने के लिए सुरक्षित स्थान के तौर पर पेशाबघर में घुस गया। उसने पुरुषों के लिए निर्धारित पेशाबघर चुना। यदि वह असभ्य या गलत नीयत वाला होता तो महिला पेशाबघर में भी घुस सकता था।जान के लाले पड़े होने पर भी जो सामाजिक नैतिकता का पालन करे, उसे शिक्षा का अधिकार क्यों नहीं मिलना चाहिए? परंतु जैसा मैंने ऊपर कहा कि तेंदुए का भाग्य अच्छा नहीं था। उसे आधुनिक तकनीक से पेशाबघर में छुपे होने के बावजूद खोज लिया गया और बेहोश करने के बाद पिंजरे में डालकर पुनः जंगल के हवाले कर दिया गया। यह उच्च कुलीनों द्वारा शिक्षा की अभिलाषा रखने वाले शूद्रों के कानों में पिघला शीशा भर देने से किसी प्रकार कम नहीं था।(
स्कूल पहुंचा तेंदुआ









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