यह पोस्ट पुलिस की तरफदारी में नहीं है

राजेश बैरागी।बचपन की एक घटना के कारण मैं पुलिस के प्रति असहिष्णु था। मेरा पत्रकारिता में प्रवेश का कारण भी संभवतः यही रहा। धीरे धीरे जब चीजें समझ में आने लगीं तो पुलिस की कार्यशैली और उसके कामकाज की चुनौतियों से भी सामना हुआ। पुलिस दरअसल क्या है? समाजशास्त्र की भाषा में कहें तो एक ऐसा सरकारी बल जिसे शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए जन्म दिया गया था। पुलिस सरकार का इकबाल कायम रखती है। समाज और अपराध एक दूसरे में गुत्थमगुत्था रहते हैं। अपराधियों को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को उनकी मानसिकता से आगे जाकर सोचना समझना पड़ता है। गंभीर किस्म के अपराधियों से रहस्य उगलवाने के लिए अमानवीय तरीके आजमाने पड़ते हैं। पुलिस की कठोरता अपराधियों में भय बनाए रखती है। इसके बावजूद अपराध और अपराधियों का अस्तित्व बना रहता है। पुलिस कथित तौर पर एक भ्रष्टतम विभाग है और प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से विभिन्न प्रकार के अपराधों में उसकी सतत् भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता है। फिर भी पुलिस की आवश्यकता पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं है। पुलिस है तो नागरिक सुरक्षा का अनुभव करते हैं। पुलिस के न होने की कल्पना से भी कंपकंपी छूट सकती है। प्रश्न यह है कि पुलिस आखिर अपने काम को अंजाम दे तो कैसे? क्या सीधे स्वभाव से पुलिस अपराधियों को नियंत्रित कर सकती है? साहिबाबाद(गाजियाबाद) थाना प्रभारी निरीक्षक द्वारा बांग्लादेशी नागरिक की पहचान के लिए एक तथाकथित मशीन के उपयोग का मामला इतना कुख्यात क्यों हुआ? क्या कोई घुसपैठिया आसानी से अपनी वास्तविक पहचान उजागर करता है। उसकी सच्चाई जानने का संभवतः यह सबसे सरल और मानवीय तरीका था। संदेह के आधार पर उसे थाना लाकर थर्ड डिग्री अप्लाई करने की अपेक्षा तो बेहद मानवीय था। पुलिस द्वारा इस घटनाक्रम की खुद ही वीडियो रिकॉर्डिंग की गई थी।हो न हो इस जांच दल में शामिल किसी पुलिसकर्मी द्वारा ही अपने इंस्पेक्टर की फजीहत करने के लिए यह वीडियो रिकॉर्डिंग लीक की गई हो। तो भी इस घटनाक्रम में गलत क्या था। दरअसल यह सोशल मीडिया के दुरुपयोग का मामला है। सोशल मीडिया पुलिस की सभी अमानवीय हरकतों पर किसी हद तक लगाम लगाने का एक सशक्त माध्यम बन गया है। क्या सोशल मीडिया स्वयं अमानवीय हस्तक्षेप की सीमा लांघ रहा है? यही प्रश्न सोशल मीडिया के औचित्य का सबसे बड़ा प्रश्न है।(

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