राजेश बैरागी।क्या सरकारी कार्यालयों में, खासतौर पर प्राधिकरणों में एक दो अधिकारी ऐसे नियुक्त किए जाते हैं जो गंभीर मुद्दों पर आम जनता के आक्रोश के लिए सेफ्टी वॉल्व का काम करते हैं? ऐसे अधिकारी अपनी समस्याएं लेकर आने वाले लोगों के समक्ष अपने ही साथी अधिकारियों को न केवल गरियाते हैं बल्कि उनके लिए ऐसे ऐसे अपशब्द बोलते हैं कि यदि वह अधिकारी सामने हो तो दोनों अधिकारियों के बीच जूतम पैजार की नौबत आ जाए। दिलचस्प बात यह है कि ऐसे अधिकारी नाटक पूरा करते हैं परंतु काम किसी का नहीं करते और आक्रोश से भरे लोग शांत होकर उनका गुणगान करते हुए अपने घर लौट जाते हैं।
मैं ऐसे कुछ अधिकारियों को जानता हूं। उनमें से एक के समक्ष पीड़ित लोगों का जमावड़ा लगा था। पीड़ा को हमेशा बड़ा करके बताया जाता है और अधिकारी हमेशा उसे छोटा मानकर सुनता है। उपरोक्त वर्णित गुणों से भरपूर वह अधिकारी बड़े इत्मीनान से पीड़ितों की समस्या सुनते सुनते अचानक उग्र हो गए। उन्होंने अपने साथी अधिकारी को खूब गरियाया। खूब अपशब्द कहे। उन्हें किसी मरहूम बादशाह का अवतार बताकर उसकी खिल्ली उड़ाई। पीड़ितों के चेहरों पर संतुष्टि का भाव उभर आया। उन्हें लगने लगा कि सभी अधिकारी बुरे नहीं होते हैं। कुछ अच्छे भी होते हैं जैसे ये हैं जो पीड़ितों के मर्म को समझते हैं और सम्वेदना का स्तर कितना ऊंचा है कि अपने साथी अधिकारी को न केवल कोस रहे हैं बल्कि गाली भी दे रहे हैं। पीड़ितों का हौंसला बढ़ा तो उन्होंने अपनी समस्याओं से संबंधित कागज आगे बढ़ाते हुए उन अधिकारी से कार्रवाई करने का अनुरोध किया। पीड़ितों को अनुमान हो गया था कि बस वह मंजिल आ गई है जिसके लिए वह कब से भटक रहे थे। परंतु यह क्या? अधिकारी ने कागजों को हाथ भी नहीं लगाया।बस इतना कहा,अरे ये सब रखो। मैं तुम लोगों का सब काम ऐसे ही करा दूंगा। देखता हूं कैसे कोई काम नहीं करता। पीड़ितों के हाथ अधिकारी की लंबी आयु के लिए दुआएं देने को ऊपर उठ गये। बाहर निकलते हुए एक सत्पुरुष ने उनसे कहा, यह अधिकारी वास्तव में बातों का स्मगलर है








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