एनसीआर में वायु प्रदूषण पर हाहाकार का धंधा

राजेश बैरागी।मैं राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में बढ़ते वायु प्रदूषण को लेकर हमेशा चिंतित रहता हूं परंतु उसे रोकने के लिए सरकार और स्थानीय निकायों द्वारा किए जाने वाले उपायों को कभी गंभीरता से नहीं लेता। प्रतिवर्ष अक्टूबर बीतते बीतते दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों के वातावरण में हल्की काली चादर फैलने लगती है और दिसंबर में यह पूरी तरह छा जाती है। इसके साथ ही सभी प्रकार के समाचार माध्यमों और सोशल मीडिया में भी वायु प्रदूषण को लेकर हाहाकार मचने लगता है। जनवरी बीतने के साथ यह काली चादर सिमट कर कहीं गायब हो जाती है,समाचार माध्यमों से भी।तो क्या इन तीन महीनों और इस दौरान रहने वाला मौसम इस भयंकर वायु प्रदूषण का प्रमुख कारण होता है? पंजाब हरियाणा में पराली जलना, वाहनों से उत्सर्जित धुआं और न जाने कितने इस प्रश्न के उत्तर हैं और उनसे संतुष्ट होना संभव नहीं है।मैंने आज नोएडा में एक प्रमुख सड़क पर मैकेनिकल स्वीपिंग करते एक ट्रक नुमा गाड़ी को देखा। इस वाहन के नीचे लगभग घिस चुके ब्रश लटक रहे थे।यह गाड़ी बहुत जोर लगाकर धीरे धीरे आगे बढ़ती है। इससे सड़कों की जितनी सफाई होती है, उससे कहीं ज्यादा यह खनिज तेल यथा डीजल फूंकती हुई वायु को प्रदूषित करने वाला धुआं छोड़ती है। आज ही नोएडा प्राधिकरण के मुख्य कार्यपालक अधिकारी डॉ लोकेश एम ने मातहत अधिकारियों को केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव के द्वारा कल दिये गये निर्देशों के क्रम में प्राधिकरण के सभी वाहनों को भारत स्टेज-6 में अपग्रेड करने तथा ईवी वाहनों में बदलने का आदेश दिया। प्राधिकरण परिवहन विभाग को भी पत्र लिखेगा कि ईवी वाहनों को बढ़ावा दे और उनकी चार्जिंग की सुविधा बढ़ाए। मैं प्राधिकरण पर सतत् निगाह रखूंगा और फरवरी मार्च में पता करके अपने पाठकों को बताऊंगा कि प्राधिकरण के कितने वाहन बीएस-6 और ईवी में बदले। दिल्ली और उसके आसपास के उपग्रह शहरों यथा नोएडा,ग्रेटर नोएडा, गुरुग्राम, फरीदाबाद, सोनीपत आदि में वायु प्रदूषण को लेकर हाय-हाय करना और रोकने का उपाय करना क्या एक बड़ा धंधा बन चुका है? कभी इस क्षेत्र में बाढ़ नियंत्रण एक बड़ा मौसमी धंधा हुआ करता था। हालांकि यह भी एक मौसमी धंधा है परंतु है बहुत चौखा। जनपद में तैनात एक उच्च अधिकारी ने आज शाम अपने केरल प्रवास को याद करते हुए बताया कि वहां अपने कर्तव्य के प्रति ईमानदार सरकारी कर्मचारी हैं। वहां दिन में तीन तीन बार सड़कों को बुहारा जाता है। और यहां? सफाईकर्मियों से काम लेना ही एक बड़ी चुनौती है। सड़क किनारे पेड़ों की धुलाई में बड़ा भ्रष्टाचार है। अब मुख्य कार्यपालक अधिकारी डॉ लोकेश एम के निर्देश पर सड़कों के किनारे कच्चे स्थानों पर घास और टाईल्स लगाने का धंधा चलेगा। यह काम शुरू होने तक जनवरी बीत चुकी होगी। फिर अगले अक्टूबर तक वायु प्रदूषण को उठाकर ताख पर रख दिया जाएगा। धंधे और भी बहुत हैं,यह कोई अकेला धंधा तो नहीं है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *