-राजेश बैरागी-
क्या प्रेरणाप्रद, सामाजिक मूल्यों की शिक्षा और हृदय को मनोरंजक सुकून देने वाली फिल्मों का युग चला गया है? संतानों के लिए वर्जित फिल्में बनाने का क्या उद्देश्य हो सकता है जबकि डिजिटाइजेशन और सोशल मीडिया के युग में कुछ भी छिपा ले जाना संभव नहीं है? इन्हीं प्रश्नों के साथ इस सोमवार की देर शाम जब मैं फिल्म ‘धुरंधर’ देखकर सिनेमा हॉल से बाहर आया तो भी मैं आलोचना करना नहीं बल्कि समीक्षा लिखना चाहता था।

वैसे भी वर्तमान समय में आलोचना करना अच्छा नहीं माना जा रहा।यह तब और भी कठिन हो जाता है जब मामला तथाकथित राष्ट्रभक्ति से जुड़ा हो। परंतु साढ़े तीन घंटे लंबी हिंदी फिल्म ‘धुरंधर’ को देखने के बाद यह प्रश्न पूछना अनिवार्य हो जाता है कि आखिर फिल्मों में इतनी हिंसा दिखाने की क्या आवश्यकता है? इस फिल्म में कंधार विमान अपहरण कांड से लेकर संसद पर हमले तक की घटनाओं के सभी मसाले डाले गए हैं और सभी मसाले गर्म हैं। फिल्म लगभग तीन घंटे पाकिस्तान में ही चलती है। आईएसआई और दूसरे आतंकी संगठनों के मंसूबे, उनके द्वारा किए जा रहे भारत विरोधी कार्यों तथा पाकिस्तान में भी समान रूप से पांव पसार चुके अपराध और राजनीति के खुलेआम गठबंधन को इस फिल्म में विस्तार से दर्शाया गया है। वहां भारत की खुफिया एजेंसियों की घुसपैठ को भी नाटकीय ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

यह सब ठीक है। फिल्म को कुल आठ चैप्टरों में बांट कर पेश किया गया है और आठवें चैप्टर को फाइनल चैप्टर बताने के बावजूद फिल्म के अंत में ‘टू बी कन्टीन्यूड……’ लिखकर इसका अगला भाग बनने की सूचना दी गई है। फिल्म को अच्छी और बुरी बताने से अलग बात यह है कि फिल्म अत्यधिक हिंसक है। ऐसी फिल्में राष्ट्र प्रेम का चाहे जितना ज्वार पैदा करें, दर्शकों को नग्न हिंसा से प्रभावित किए बगैर नहीं छोडे़गी।शास्त्रों में जिन नवरसों का वर्णन किया गया है, उनमें से एक वीभत्स रस का उपयोग बहुत कम हुआ है।क्या हम अब उसी वीभत्स रस का आनंद लेने लगे हैं? यदि ऐसा है तो यह किसी आपदा से कम नहीं है।(नेक दृष्टि)(ऐसे ही अन्य समाचारों आलेख के लिए हमारी वेबसाइट www.nekdristi.com देखें)









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