नोएडा प्राधिकरण:मुख्य कार्यपालक अधिकारी की दूसरी कठोर कार्रवाई,आठ अधिकारियों के वेतन पर रोक

राजेश बैरागी।क्या नोएडा प्राधिकरण में मुख्य कार्यपालक अधिकारी डॉ लोकेश एम के नेतृत्व में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है और क्या मातहत अधिकारियों द्वारा उनके सामान्य निर्देशों का भी पालन नहीं किया जा रहा है? उनके द्वारा आज और हाल ही में की गई दो कठोर कार्रवाईयों से ऐसे ही संकेत मिल रहे हैं।
नोएडा प्राधिकरण ने आज सप्ताह और महीने के पहले दिन ही अपने आठ वरिष्ठ अधिकारियों के वेतन निकालने पर अस्थाई रोक लगा दी। ये अधिकारी हैं – क्रांति शेखर सिंह विशेष कार्याधिकारी (ग्रुप हाउसिंग),अरविन्द कुमार सिंह विशेष कार्याधिकारी (भूलेख),ए०के० अरोड़ा महाप्रबंधक (सिविल),एस०पी० सिंह महाप्रबंधक (सिविल),आर०पी० सिंह महाप्रबंधक (जल),श्रीमती मीना भार्गव महाप्रबंधक (नियोजन),श्रीमती प्रिया सिंह सहायक महाप्रबंधक (औद्योगिक), संजीव कुमार बेदी सहायक महाप्रबंधक (आवासीय भूखंड)। इन सभी अधिकारियों पर शासन को एकीकृत शिकायत निवारण तंत्र (आईजीआरएस) पर प्राप्त शिकायतों का निस्तारण न करने का आरोप है। इससे पहले मुख्य कार्यपालक अधिकारी डॉ लोकेश एम ने सितंबर के पहले सप्ताह में अपने मातहत अपर मुख्य कार्यपालक अधिकारियों और महाप्रबंधक तथा उप महाप्रबंधक अभियंताओं को हासिल दो करोड़ रुपए तक के टेंडर जारी के अधिकारों पर रोक लगा दी थी। यह रोक अभी तक जारी है।अति आवश्यक कार्यों को कराने के लिए अभियंताओं को सीधे मुख्य कार्यपालक अधिकारी से आदेश हासिल करने पड़ रहे हैं।आईजीआरएस पर प्राप्त शिकायतों के निस्तारण में विफल रहने के दोषी अमूमन सभी अधिकारी अपने अपने विभागीय कार्यों में सुबह से लेकर देर शाम तक जुटे रहते हैं। इनमें से कुछ अधिकारी तो प्राधिकरण की रीढ़ जैसे माने जाते हैं। फिर मुख्य कार्यपालक अधिकारी की नाराज़गी की क्या वजह हो सकती है? जुलाई 2023 में नियुक्त हुए डॉ लोकेश एम नोएडा प्राधिकरण के एकमात्र ऐसे मुख्य कार्यपालक अधिकारी हैं जिनका स्वागत ढोल नगाड़े बजाकर किया गया था। हालांकि लगभग ढाई वर्ष गुजरने के बाद भी यह रहस्य ही है कि उनके आगमन पर ढोल नगाड़े किसने बजवाये थे और क्यों। अपने ढाई वर्ष के कार्यकाल में डॉ लोकेश एम ने नोएडा प्राधिकरण का ठीक-ठीक नेतृत्व किया है। हालांकि कर्मचारियों की तंगी और उलझे हुए मामलों के चलते परफॉर्मेंस साबित करना भी एक चुनौती ही है। इस स्थिति में अधिकारियों के साथ कठोर कार्रवाई और अधिकारों में कटौती करने से व्यवस्था लड़खड़ा सकती है। हालांकि कभी-कभी ऐसा लगने लगता है कि यह व्यवस्था न भी हो तो क्या फर्क पड़ता है

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