राजेश बैरागी।सदियों पुरानी पुलिस प्रणाली के स्थान पर उत्तर प्रदेश के कुछ जनपदों में लागू की गई कमिश्नरेट पुलिस प्रणाली तथा उसे दिए गए अधिकारों को लेकर एक बार फिर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं। इस बार यह प्रश्न किसी आम नागरिक ने नहीं बल्कि उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा उठाए गए हैं। गैंगस्टर एक्ट और संगठित अपराध अधिनियम मामलों को लेकर दायर एक याचिका की सुनवाई कर रही एकल पीठ के न्यायाधीश न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने उत्तर प्रदेश सरकार से तीन प्रश्नों का उत्तर देने को कहा है। इन प्रश्नों में पूछा गया है,- क्या अपराधों की रोकथाम में पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली पुरानी पुलिस व्यवस्था से अधिक कारगर है? कमिश्नरेट प्रणाली में गैंगस्टर एक्ट के तहत आवश्यक संयुक्त बैठक से जिलाधिकारी को बाहर क्यों रखा गया है? तथा क्या कमिश्नरेट के पुलिस अधिकारियों को ऐसा प्रशिक्षण दिया गया है जिससे वे पहले जिलाधिकारी द्वारा किए जाने वाले काम संभाल सकें? दरअसल पुलिस कमिश्नरेट में कानून व्यवस्था की समस्त शक्तियां पुलिस में निहित हो जाती हैं। पहले कानून व्यवस्था जिला प्रशासन और पुलिस की संयुक्त जिम्मेदारी थी और जिलाधिकारी गैंगस्टर तथा संगठित अपराध जैसे मामलों में सर्वोच्च अधिकारी होता था।वह व्यवस्था पुलिस और प्रशासन के बीच चेक एंड बैलेंस का काम करती थी। कानून व्यवस्था और भूमि पर रास्ते आदि के विवाद(धारा 133) के मामले भी पुलिस को सौंप देने से स्थिति एकतरफा हो गई है। पुलिस जो केवल एक बल है, कमिश्नरेट प्रणाली में उसे निर्णय और न्याय करने के अधिकार भी सौंप दिए गए हैं। इसके लिए पुलिस को न तो कोई ज्ञान होता है और न उसे प्रशिक्षण ही दिया गया है। राजेन्द्र त्यागी और दो अन्य लोगों द्वारा दायर याचिका में पुलिस को दिए गए इन अधिकारों, गैंगस्टर एक्ट व संगठित अपराध अधिनियम के तहत दर्ज किए जाने वाले मामलों तथा जिलाधिकारी की भूमिका समाप्त करने पर प्रश्न उठाए गए हैं। उच्च न्यायालय ने इन प्रश्नों पर गृह सचिव से शपथपत्र प्रस्तुत करने का आदेश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 9 दिसंबर को होगी।
यहां यह भी गौरतलब है कि कमिश्नरेट पुलिस प्रणाली वाले जनपदों में पुलिस सर्वोच्च हो गई है। पुलिस के अधिकारों और उसके स्वच्छंद व्यवहार के समक्ष जिला प्रशासन बौना दिखाई देता है। न्यायालय भी कमिश्नरेट पुलिस प्रणाली के साथ सहज नहीं हैं। गौतमबुद्धनगर जिला न्यायालय में नियुक्त रहे एक जिला जज ने निजी बातचीत में इसे बेलगाम पुलिस व्यवस्था करार दिया था। गौतमबुद्धनगर और गाजियाबाद जनपदों में कार्यरत विकास प्राधिकरण और स्थानीय निकाय कमिश्नरेट पुलिस के असहयोग के चलते अवैध कॉलोनियों, अतिक्रमण आदि समस्याओं से जूझ रहे हैं








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