अब तक छप्पन

राजेश बैरागी।छप्पन वर्ष पहले ऐसे ही एक सर्द दिन (29 जनवरी 1970 )की भोर में जब मैंने जन्म लिया तो यह कोई युगांतरकारी घटना नहीं थी।तीन सप्ताह पूर्व जन्मी पौत्री को गोद में लिए हुए विचार आया कि तब मैं भी ऐसा ही तो रहा हूंगा। मां पिताजी की गोद में दुनिया से अनजान और केवल पेट भरने के लिए रोने वाला एक नन्हा सा बच्चा।कल एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी सांख्य दर्शन की चर्चा करते हुए बता रहे थे कि हम जो हैं उसकी खोज कभी नहीं करते। क्या हम जीवन भर एक गोद में खिलाए जाने लायक बच्चे बने रहते हैं? अध्यात्म में गहरे उतरने के बजाय मैं वापस अपने बीते हुए छप्पन वर्षों पर इस पोस्ट को केंद्रित रखना चाहूंगा। साढ़े पांच वर्ष की आयु में विद्यालय में प्रवेश, उत्तरोत्तर शिक्षा प्राप्त करते हुए स्नातक और परास्नातक उपाधियां प्राप्त करना। इस बीच वैवाहिक बंधन में बंधना, बच्चे पैदा होना,पेशे के तौर पर पत्रकारिता को अपनाना और पहले नाना तथा अब दादा बन जाना। क्या सभी लोगों का जीवन इन्हीं घटनाओं का संगठन मात्र होता है? खैर छोड़िए इन बातों को। मैं आयु के इस पड़ाव पर अपने माता-पिता के प्रति अत्यंत कृतज्ञ हूं जिन्होंने मुझे जन्म दिया। मैं उन गुरुजनों के प्रति अत्यंत कृतज्ञ हूं जिन्होंने मुझे न केवल शिक्षित किया बल्कि इस जीवन को भली प्रकार जीना सिखाया।उन मित्रों, जीवन के विभिन्न पड़ावों पर मिले और बिछुड़ गये उन सभी लोगों के प्रति भी कृतज्ञ हूं जिन्होंने किसी न किसी रूप में मेरे जीवन को प्रभावित किया। बीते समय पर जहां तक दृष्टि डालता हूं तो पाता हूं कि मैंने खोया बहुत कम है और जो पाया है वह मेरी अपेक्षाओं से अधिक ही है। मैं प्रतिदिन शयन अवस्था में जाने से पहले स्वयं से पूछता हूं कि क्या मैंने आज के लिए निर्धारित अपने कार्यों को पूरा किया? और अक्सर मैं आश्वस्त होता हूं कि काम चाहे पूरे नहीं हुए परंतु मेरे प्रयासों में कोई कमी नहीं रही। मैं एक प्रश्न और स्वयं से पूछता हूं कि मैंने अपने चरित्र के विरुद्ध जाकर तो कुछ नहीं किया? इस प्रश्न का उत्तर हमेशा हां में नहीं होता है। कभी कभी मैं वैसा भी कुछ करने को विवश होता हूं जो मुझे स्वाभाविक रूप से स्वीकार्य नहीं है। यही वह बंधन है जिंससे मुक्ति के लिए हमें प्रयास करना चाहिए। फिर भी मैं इस अभिमान से भरा रहता हूं कि मैं अपनी दिनचर्या में अधिकांश वही करता हूं जो मेरे स्वभाव के अनुकूल होता है। और स्वभाव की अनुकूलता यही है कि मैं किसी के दुख का कारण न बनूं। इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि मैं दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों को प्रति विनम्र रहूं। यह न मेरे स्वभाव से मेल खाता है और न मैं अपने पेशे के प्रति ईमानदार रह सकता हूं। जीवन के छप्पन वर्ष संपन्न होने के बाद मेरी आस्था और विश्वास और भी दृढ़ हुए हैं। आज ही एक वरिष्ठ शुभचिंतक ने जन्मदिन पर शुभाशीष देते हुए कहा कि आप और यशस्वी हों, समृद्ध हों। मैंने उन्हें धन्यवाद देते हुए केवल इतना कहा कि मैं लोगों की शुभकामनाओं की समृद्धि चाहता हूं। यही मेरा यश हो

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